अहिंसा
शुद्धि के लिए जाते समय मुनिराज कागज की पुड़िया में बेसन ले जाते थे। 2013 में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा… कागज भी क्यों ले जाना ! आरंभिक हिंसा बचेगी तथा नमी से जीव पैदा हो जाते हैं, बेसन की मर्यादा भी तीन दिन की होती है। तब से मुनिराज कमंडलु का ढक्कन उल्टा कर के उसमें बेसन ले जाने लगे।
आचार्य श्री मूलाचार से भी आगे बढ़कर आचरण करते और अपने शिष्यों से करवाते थे।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 4 जुलाई)




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अहिंसा का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः अहिंसा का पालन करने के लिए श्रमण को मूलाचार के अनुसार चलना परम आवश्यक है।