विशालता
विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान।
एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास।
संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान।
एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास।
संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
2 Responses
विशालता का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए संसारी सुख में विशालता रखना धर्म के विपरीत होता है। अतः संसारी विशलता की जगह परमार्थ क्षेत्र में रखना परम आवश्यक है।
Bahut hi wonderful post hai ! Gurudev ke charnon me shat shat naman !