अचित्त
अचित्त सेवन से वातादि दोष नहीं होते हैं। जोड़ों के दर्द में लाभ, खासतौर पर शीतकाल में। अपच भी नहीं। शरीर में हलकापन। सचित्त में जीव (त्रस) होते ही हैं, शरीर के अंदर जाकर भी उत्पत्ति।
इसीलिये, कहा है –-> “सावद्य लेशो बहु पुण्य राशो”।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 7/35 )



