राग –> हिलमिल कर रहना।
मोह –> उनके बिना न रह पाना।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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राग/मोह को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु राग एवं मोह से बचना परम आवश्यक है। जीवन में राग भगवान् से रखना आवश्यक है,अन्य किसी से रखना उचित नहीं है।
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राग/मोह को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु राग एवं मोह से बचना परम आवश्यक है। जीवन में राग भगवान् से रखना आवश्यक है,अन्य किसी से रखना उचित नहीं है।