Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

भगवान की वाणी

भगवान की वाणी को भोजन की तरह पूरा खोलकर, हर किसी के सामने परोसते नहीं रहना चाहिये वरना उसका महत्त्व कम हो जाता है। उपदेश

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धर्म

धर्म दो प्रकार का – 1. श्रावकों का…. अनुष्ठान की प्रमुखता, 2. श्रमणों (साधुओं) का…. अध्यात्म की प्रमुखता। आचार्य श्री विद्यासागर जी (क्योंकि श्रावकों का

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संस्कारों पर विजय

हींग की डिब्बी से गंध कैसे दूर हो ? 1. केसर को ज्यादा-ज्यादा मात्रा में बार-बार भरने से। बार-बार शुभ क्रियाओं से, अशुभ संस्कार खत्म

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स्वाध्याय

एक बार खोदने से हीरा नहीं मिलता, बार बार खोदने से मिलता है। ग्रंथ भी बार बार पढ़ने से तत्त्व समझ आता है। आचार्य श्री

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ध्यान / विज्ञान

स्वस्थ ज्ञान का नाम ध्यान है। अस्वस्थ ज्ञान का नाम विज्ञान। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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संग्रह / परिग्रह

संग्रह इसलिये ताकि अपने और दूसरों के आपात-काल में काम आये। परिग्रह…”चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाय” की प्रवृत्ति। इसलिये संग्रह का विरोध नहीं पर

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दया

दया के अभाव में शेष गुण कार्यकारी नहीं, दया गुण रूपी माला का धागा है। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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गुरु-वचन

गुरु के द्वारा दिये गये सूत्र, मंत्र हैं। ये सूत्र शास्त्र से भी ज्यादा आनंद देने वाले/ छोटे तथा सरल रास्ते से मंज़िल दिलाने वाले

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निंदा

पर्वतों की चोटियों पर तप करने से भी ज्यादा कर्म कटते हैं, निंदा को सहन करने से। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मोक्षमार्ग

ठंडे बस्ते में, मन को रखना ही, मोक्षमार्ग है। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मंगल आशीष

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