Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

तन / चेतन

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. जितना-जितना तन को सजा रहा है, उतना-उतना चेतन को सज़ा दे रहा है। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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मुनि

मुनि को हाथी की संज्ञा दी जा सकती है। हाथी को महावत नियंत्रित करता है, मुनि को महाव्रत। नियंत्रित करने वाला अंकुश यदि गिर जाता

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मोक्षमार्ग

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “मोक्षमार्ग बाहर है ही नहीं।” जैसे हवाई जहाज उठने के बाद बाहर दौड़ने में सहायक, पहियों को भी अंदर

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संयम

ज्ञान प्राण है। संयत हो तो त्राण*। अन्यथा श्वान। *मुक्ति। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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स्त्री

स्त्री… संयम + त्रि (धर्म, अर्थ, काम)। आचार्य श्री विद्यासागर जी नारी तो नारायण की जननी है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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दर्शन / अध्यात्म

दर्शन के बिना अध्यात्म, जीवन चल सकता है। बिना अध्यात्म के, दर्शन का दर्शन नहीं। अध्यात्म स्वाधीन नयन है। दर्शन पराधीन, उपनयन है (उदाहरण चश्मा)।

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तारीफ़

तारीफ़ नहीं, अपनी ओर देख, चक्कर नहीं। (जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं)। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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अंतरंग यात्रा

गाड़ी जब रिवर्स में जाती है तब गति तो कम पर सावधानी ज्यादा रखनी पड़ती है। ऐसे ही बाहर से अंदर की यात्रा करते समय

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स्वभाव

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं… पहले… भूमि पर उगे बरगद की तरह जो सबको छाया आदि देते हैं। दूसरे… उस बरगद जैसे जो दीवार

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भक्त से भगवान

भक्त से भगवान… भगवान के सामने बोलो/ अनुभव करो… “दासोहम्”। अगले कदम पर “उदासोहम्” (संसार से)। अंत में… “सोहम्”। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मंगल आशीष

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