Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

भक्ति

आचार्य श्री विद्यासागर जी (…ऐसी प्रकृतियों का बंध होता है…)

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नम्रता

बड़ों के प्रति नम्रता कर्तव्य है, तो हम-उम्र के प्रति विनय की सूचक, अनुजों के प्रति कुलीनता की द्योतक एवं सबके प्रति सुरक्षा है। आचार्य

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किसके पीछे?

कौन किसके पीछे भागता है? घर वालों के पीछे पाप या पाप के पीछे घर वाले? बड़े तो पाप के पीछे ही भागते हैं इसलिये

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मोह

क्रोध, मानादि AC Current हैं, Shock देते हैं। मोह DC, चिपका लेता है, जब तक पूरा न चूस ले। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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कितना ?

रिक्त को भरने की मनाही नहीं, अतिरिक्त में दोष है। फिर चाहे वह भोजन हो या धन। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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संकलन

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… बांध-बांध कर क्यों रखना ! जब ख़ुद को बंध कर जाना ही है। अर्थी पर भी, कर्मों से भी

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ब्रह्मचर्य

आचार्य श्री विद्यासागर जी…. उधारी 40 वर्ष पुरानी हो जाये तो खाते में से निकाल देते हैं। शादी 40 साल तक नहीं हो तब तो

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विचार / शरीर

जब तक हमारे विचारों में शुद्धि, सामर्थ्य तथा एकता न हो, शरीर के कोशिकाओं की तंदुरुस्ती, सामर्थ्य तथा एकता को बनाए रखना असम्भव है। आचार्य

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समता

अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मंगल आशीष

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