जियो और जीने दो
साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
* अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।
साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
* अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।
One Response
जियो और जीने दो का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। श्रमण तो आत्म साधना में लीन रहतें है। जबकि श्रावकों को भी आत्म हित के लिए जीना परम आवश्यकता है।