1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी।
2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उल्लंघन।
3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति।
4. अनाचार –> दोष से हट न पाना।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 7/23)</span
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दोष को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दोष से मुक्ति होने का प़यास करना परम आवश्यक है।
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दोष को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दोष से मुक्ति होने का प़यास करना परम आवश्यक है।