संसार में कुछ नया नहीं, कर्म भी (जो उदिष्ट हैं/ पंच परावर्तन पुनरावृत्ति है)।
धर्म में नयापन है (क्योंकि हर क्षण भावों/ अनुभूति के अनुसार परिणमन/ परिवर्तन है)।
मुनि श्री सौरभसागर जी
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7 Responses
नया/पुराना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अपने भावों को एवं कर्म सिद्धांत पर शुद्बता रखना परम आवश्यक है।
धर्म अनुभूति पर आधारित है। शुरू में पढ़ते हैं/ सुनते हैं बाद में अनुभूति से उसे रियलाइज़ करते हैं । अनुभूति की कोई सीमा नहीं होती है, अनंत है। देवलोक में जो धर्म चर्चा चलती है, वह 33 सागर तक रिपीट नहीं होती।
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नया/पुराना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अपने भावों को एवं कर्म सिद्धांत पर शुद्बता रखना परम आवश्यक है।
‘धर्म में नयापन है (क्योंकि हर क्षण परिणमन/ परिवर्तन है)’; Is statement ka meaning explain karenge, please ?
धर्म अनुभूति पर आधारित है। शुरू में पढ़ते हैं/ सुनते हैं बाद में अनुभूति से उसे रियलाइज़ करते हैं । अनुभूति की कोई सीमा नहीं होती है, अनंत है। देवलोक में जो धर्म चर्चा चलती है, वह 33 सागर तक रिपीट नहीं होती।
Okay.
Is post me ‘उदिष्ट’ ka kya meaning hai, please ?
भोग कर छोड़ा हुआ।
It is now clear to me.