नया / पुराना

संसार में कुछ नया नहीं, कर्म भी (जो उदिष्ट हैं/ पंच परावर्तन पुनरावृत्ति है)।
धर्म में नयापन है (क्योंकि हर क्षण भावों/ अनुभूति के अनुसार परिणमन/ परिवर्तन है)।

मुनि श्री सौरभसागर जी

Share this on...

7 Responses

  1. नया/पुराना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए अपने भावों को एवं कर्म सिद्धांत पर शुद्बता रखना परम आवश्यक है।

  2. ‘धर्म में नयापन है (क्योंकि हर क्षण परिणमन/ परिवर्तन है)’; Is statement ka meaning explain karenge, please ?

    1. धर्म अनुभूति पर आधारित है। शुरू में पढ़ते हैं/ सुनते हैं बाद में अनुभूति से उसे रियलाइज़ करते हैं । अनुभूति की कोई सीमा नहीं होती है, अनंत है। देवलोक में जो धर्म चर्चा चलती है, वह 33 सागर तक रिपीट नहीं होती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This question is for testing whether you are a human visitor and to prevent automated spam submissions. *Captcha loading...

Archives

Archives
Recent Comments

December 11, 2025

May 2026
M T W T F S S
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031