हास्य आदि आत्मा के स्वभाव नहीं।
चिंता/ मद आदि का अभाव सामान्य/ प्रसन्न भाव है,
जो आचार्य विद्यासागर जी तथा भगवान में पाया जाता था (मूर्तियों में दिखता है)।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय 8/9)
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प्रसन्न भाव को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
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प्रसन्न भाव को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।