उत्तम आर्जव धर्म
मायाचारी का उल्टा/ मन वचन काय की एकरूपता आर्जव धर्म है।
एक मासोपवासी(बहुत अंतराल के बाद आहार लेने वाले) मुनिराज तपस्या करके चले गए। उसी स्थान पर एक दूसरे मुनिराज तपस्या करने लगे। लोगों ने समझा वही मासोपवासी मुनिराज हैं और वे जय जयकार करने लगे। दूसरे मुनिराज इस भ्रम को समझ तो गए पर उनके मन में यह भाव आगया कि मैं थोड़े ही मायाचारी कर रहा हूं, इन लोगों ने गलत समझा तो मैं क्या करूं। इस जरा से मायाचारी के भाव से उनका दिगंबरत्व दिगंबर(नग्नता) हो गया और अगले जन्म में वह हाथी बने। माया करने से पशु की काया मिली।
सावधान! यदि हम मायाचारी करेंगे तो अगले जन्म में जानवर बनेंगे। जब कर्मों ने बड़े-बड़े मुनिराजों को नहीं छोड़ा, वे हमको क्या छोड़ेंगे!



