कर्म
कर्म चोर बहु फिरत हैं…
यह कहावत सही नहीं है। कर्म तो साहूकार हैं, उनका कर्ज़ा कभी चुकता नहीं है।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
(सही कहा है…ब्याज दर ब्याज लगती जाती है, एक कर्म उदय में आया, हमने रागद्वेष किया। कटा एक, बंधे चार)
चिंतन
कर्म चोर बहु फिरत हैं…
यह कहावत सही नहीं है। कर्म तो साहूकार हैं, उनका कर्ज़ा कभी चुकता नहीं है।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
(सही कहा है…ब्याज दर ब्याज लगती जाती है, एक कर्म उदय में आया, हमने रागद्वेष किया। कटा एक, बंधे चार)
चिंतन
3 Responses
कर्म का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में जो कर्म करते हैं,उसका हिसाब देना पड़ता है, अतः कर्म समाप्त नहीं होते हैं बल्कि चक़बधि ब्याज की तरह बढ़ते रहते हैं। अतः जीवन में ऐसे कर्म करना परम आवश्यक है,जीसमें राग द्बेष,मोह,लोभ,लालच आदि की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
Magar siddha banne ke baad to कर्म, साहूकार nahi rahenge na ? Ise clarify karenge,
please ?
सही बोला, चोर तो वहां भी घूम रहे हैं, उनका स्वभाव तो चोरी करने का ही है, जहां खिड़की खुली दिखी घुस गए। सिद्ध भगवान ने तो सारी खिड़कियां बंद कर लीं हैं। कर्म चोर अंदर नहीं जा पाते तो साहूकार बनने का प्रश्न ही नहीं।
अच्छा प्रश्न था