नोकषाय
रति भाव -> द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव अच्छे लगना।
अरति भाव -> द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव से अलगाव का भाव।
शोक -> अरति के साथ ही। धीरे-धीरे Normal होता जाता है।
ऐसे ही अन्य नोकषायों में लगाना।
सारी कषायों और नोकषायों को चारित्र धारण करके ही जीता जा सकता है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय 8/9)



