भाग्य से ही पुरुषार्थ कर पाते हैं। तब और ज्यादा अच्छा भाग्य बन जाता है,
फिर ज्यादा पुरुषार्थ कर पाते हैं।
जैसे पूँजी (भाग्य) लगाने से व्यवसाय (पुरुषार्थ)।
पूँजी बढ़ती जाती है, साथ-साथ व्यवसाय भी।
चिंतन
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पुरुषार्थ/भाग्य को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु पुरुषार्थ करना परम आवश्यकता है। बिना पुरुषार्थ भाग्य कोई परिणाम नहीं मिलता है। अतः पुरुषार्थ ही भाग्य बदल सकता है।
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पुरुषार्थ/भाग्य को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु पुरुषार्थ करना परम आवश्यकता है। बिना पुरुषार्थ भाग्य कोई परिणाम नहीं मिलता है। अतः पुरुषार्थ ही भाग्य बदल सकता है।