आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात नहीं करते !
(जो शास्त्र ज्ञान/श्रद्धा के लिए बहुत आवश्यक है।)
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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स्वाध्याय का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु ज्ञान एवं श्रद्बा के लिए स्वाध्याय करना परम आवश्यक है।
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स्वाध्याय का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु ज्ञान एवं श्रद्बा के लिए स्वाध्याय करना परम आवश्यक है।
Param pujya Acharya Shri aur Niryapak muni Shri Sudhasagar ji ke charnon me shat shat naman !