उदीरणा
श्रमण तथा श्रावक दोनों ही उदीरणा करते हैं: श्रमण पापकर्म की तथा श्रावक पुण्यकर्म की।
श्रमण जितनी ज्यादा सर्दी सहेंगे, उतनी ज़्यादा पापकर्मों की उदीरणा करके निर्जरित होंगे। लेकिन श्रावक प्रतिकूलता को नहीं सहना चाहता, सो पुण्यों को समाप्त करता जाता है।
यदि पापकर्मों की उदीरणा के साथ समता/ लाभ को संबद्ध कर लें, तो श्रावक भी निर्जरा करने लगेंगे।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी




2 Responses
उदीरणा का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः श्रावकों को पाप कर्मो की उदीरणा के साथ समता का भाव होगा तो श्रावकों की निर्जरा होने लगेगी।
Wonderful post ! Namostu Gurudev !