कैसे ? श्रावक से पूछो, “बुखार है?”
श्रावक- “है।”
किन्तु श्रमण कहेगा, “नहीं।”
“पर शरीर तो गरम है!”
“शरीर को होगा, पर मुझे (आत्मा को) नहीं है।”
श्रमण का उपयोग शरीर में न होकर आत्मा में ही रहता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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उपयोग का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में यह सत्य है कि श्रमण का उपयोग शरीर से न होकर आत्मा से ही रहता है। अतः जीवन में श्रावकों को भी उपयोग आत्मा से ही करना परम आवश्यक है।
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उपयोग का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में यह सत्य है कि श्रमण का उपयोग शरीर से न होकर आत्मा से ही रहता है। अतः जीवन में श्रावकों को भी उपयोग आत्मा से ही करना परम आवश्यक है।