तप
तप की परिभाषा के बारे में आगम में कहा… “इच्छा निरोध: तप:”
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इसको सरल/ व्यावहारिक परिभाषा देते हुए कहा.. “अपेक्षा निरोध: तप:”
क्या पहली परिभाषा श्रमण के लिए है और दूसरी श्रावक के लिए ?
योगेंद्र
महाराज श्री ने बताया… बहुलता से कह सकते हैं पर दोनों परिभाषाएँ श्रमण और श्रावक दोनों के लिए लगा सकते हैं ।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान)




One Response
तप को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए तप को अपनाना परम आवश्यक है।