निस्पृहता
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने 4 साल की मेहनत के बाद मूकमाटी महाकाव्य की रचना की। एक व्यक्ति आया (जो मुनियों पर श्रद्धा नहीं रखता था), उसने डायरी को उठाकर पलटा और बोला “मैं ले जाऊँ”।
आचार्य श्री तो निस्पृही साधु थे। वे मुस्कुरा दिए, कुछ नहीं बोले। वह व्यक्ति उस डायरी को उठाकर ले गया। बाहर एक ब्रह्मचारी ने ज़ेरॉक्स कॉपी कर ली। जब पुस्तक छप कर आई तो उसमें एक जगह था… ता धन धिनदा, ता धन धिनदा; का तन चिंता, चेतन भिन्ना। ऐसी चीजों से देखकर वह व्यक्ति इतना प्रभावित हुआ कि पंचांग नमस्कार करके, आचार्यश्री को अपना गुरु बना लिया।
आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी- (जिज्ञासा समाधान – 11 फ़रवरी प्रवचन)




4 Responses
निस्पृहता का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है।
‘ता धन धिनदा, ता धन धिनदा; का तन चिंता, चेतन भिन्ना।’ Is line ka meaning clarify karenge, please ?
संगीत की इस धुन में भी आचार्य श्री को आध्यात्मिक धुन सुनाई पड़ता था।
Okay.