परिग्रह
संग्रह गृहस्थ के लिए आवश्यक है लेकिन उसे संग्रह के प्रति यदि मूर्छा आ जाती है तो वह परिग्रह का रूप धारण कर लेती है। जो दिन रात ग्रहों की तरह आसपास मँडराते रहते हैं, हम उसकी गिरफ़्त में आ जाते हैं।
जोड़ो वही जो छोड़ते समय तकलीफ न दे।
रावण के पास रानियों की क्या कमी थी ! मूर्छा के कारण ही उसने अधोगति प्राप्त की।
आज तो सबसे बड़ी परिग्रह मोबाइल है, जिसकी गिरफ़्त में हम सब हैं। उपवास से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, डिजिटल उपवास।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 अक्टूबर)




One Response
परिग्रह का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए परिग्रह का त्याग करना परम आवश्यक है। अतः जीवन में कुछ ऐसा न जोडा़ जाय जो जीवन में तकलीफ न देवे।