सिर्फ़ भाव-कर्म/पूजा/मुनि आदि का महत्व नहीं।
भाव सहित कर्म/पूजा/मुनि का महत्व होता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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4 Responses
भाव कर्म आदि को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु कर्म,पूजा,भुनि का महत्व तभी होता है ,जब हृदय में भाव होना परम आवश्यक है।
यहाँ पर भाव तीनों के लिए अलग-अलग लगेगा भावकर्म, भावमुनि इसका अपोजिट होगा द्रव्यमुनि। भाव सहित मुनि भावों की अपेक्षा कहा है, भावों को प्रधानता देते हुए।
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भाव कर्म आदि को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु कर्म,पूजा,भुनि का महत्व तभी होता है ,जब हृदय में भाव होना परम आवश्यक है।
Is post me ‘भाव-कर्म मुनि’ aur ‘भाव सहित मुनि’ ka meaning explain karenge, please ?
यहाँ पर भाव तीनों के लिए अलग-अलग लगेगा भावकर्म, भावमुनि इसका अपोजिट होगा द्रव्यमुनि। भाव सहित मुनि भावों की अपेक्षा कहा है, भावों को प्रधानता देते हुए।
Okay.