वैभव

समवसरण के वैभव को देखकर वैभव छोड़ने के भाव आते हैं ।
जैसे आग तो जलाती है पर चिराग/सूर्य प्रकाश देते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Share this on...

One Response

  1. समवसरण—तीर्थंकर की धर्म सभा को कहते हैं। जहां समस्त स्त्री, पुरुष,पशु पक्षी और देवी देवता समान भाव से भगवान का उपदेश सुनते हैं अथवा जहां सभी भव्य जीव तीर्थंकर की दिव्यध्वनि के अवसर की प्रतीक्षा करते हैं वह समवसरण है।सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर के द्वारा योग्य समवसरण की रचना की जाती है।
    यह कथन सत्य है कि समवसरण के वैभव को देखकर वैभव छोड़ने के भाव आते हैं। उसी प्रकार आग जलाती है पर चिराग और सूर्य प़काश देते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This question is for testing whether you are a human visitor and to prevent automated spam submissions. *Captcha loading...

Archives

Archives
Recent Comments

November 11, 2019

October 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031