श्री, ह्रीं… देवी
ये देवियाँ (श्री, ह्रीं, धृति, कीर्ति, बुद्धि, लक्ष्मी) भगवान की माँ की सेवा (क्रमश: शोभा, लज्जा, धैर्य, कीर्ति, बुद्धि, वैभव बढ़ाने) के लिये नियुक्त होती हैं।
ये सरोवरों में अलग-अलग महलों में रहती हैं।
व्यंतरों की इन्द्राणियाँ हैं सो ब्रह्मचारिणी नहीं है, आगम में भी नहीं कहा है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 19/3)




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श्री, ह्री, देवी का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। यह सभु भगवान् की मां की सेवा में रत रहती हैं।