सहज / सरल
इतने सहज भी न हो जाना की जानवरों की तरह बिना शर्म के कहीं भी/ कभी भी/ कुछ भी करने लग जाओ।
बच्चों की तरह इतने सरल भी न बन जाना की कोई भी बुद्धू बना जाए।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
इतने सहज भी न हो जाना की जानवरों की तरह बिना शर्म के कहीं भी/ कभी भी/ कुछ भी करने लग जाओ।
बच्चों की तरह इतने सरल भी न बन जाना की कोई भी बुद्धू बना जाए।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
One Response
सहज/सरल को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु सहज एवं सरल बनने का प़यास करना आवश्यक है, लेकिन आवश्यकता एवं जरुरतों का ध्यान रखना परम आवश्यक है।