Month: January 2025
पंचम-काल में धर्म
पंचम-काल में धर्म कब तक रहेगा ? आचार्यों के तीन मत हैं → 18500 वर्ष तक 7000 वर्ष तक 4000 वर्ष तक अवगाहना से भी
मोह
जब हमें कोई धोखा देता है/ हमारा अहित करता है, उसे हम बैरी मानते हैं। लेकिन मोह युगों से हमें धोखा देता आ रहा है/
जीव की सक्रियता
क्या जीव की सक्रियता काल के कारण है ? योगेन्द्र काल की सहकारिता तो सब पर/ सब जगह रहती है। यहाँ मुख्य/ विशेष कारण →
सुख / मज़ा / आनंद
शरीर को सुख, मन को मज़ा, आत्मा को आनंद। ब्र. डॉ. नीलेश भैया क्या पाप करने में भी आत्मा को आनंद आयेगा ? आर.के.जैन हाँ,
सल्लेखना
आचार्य श्री विद्यासागर जी के सान्निध्य में एक मुनि की सल्लेखना चल रही थी। मुनिराज जल पर आ गये थे। उन्होंने इच्छा प्रकट की →
विस्तार की कैद
एक राजा ने हिरणी के बच्चे का शिकार किया। हिरणी ने श्राप दिया → तेरा बच्चा जब स्वच्छंद घूमने लगे तब वह भी मारा जाये।
स्वरूप / लक्षण
स्वरूप त्रैकालिक। जीव का स्वरूप – स्वाभाविक → मूर्तिक/ अमूर्तिक, संकोच/ विस्तार वाला। वैभाविक → परिणमन के साथ। लक्षण → उपयोगो लक्षणम्। लक्षण जो स्वरूप
प्रवृत्ति / निवृत्ति
प्रवृत्ति में व्यवहार, नीति, धर्म। निवृत्ति में निश्चय, अध्यात्म। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मनुष्यों के प्रकार
1) भगवान को जानते ही नहीं… अज्ञानी। 2) भगवान के सही स्वरूप को नहीं जानते… मिथ्यादृष्टि। 3) भगवान को सही रूप में जानते हैं… सम्यग्दृष्टि।
आत्मा
शराबी ने नशे में सारे साथियों को भोजन का निमंत्रण दे दिया। सब पीछे-पीछे घर आ गये। पत्नी ने कह दिया –> वे घर में
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