Month: January 2025
अनंत-चतुष्टय
एक बार अनंत-चतुष्टय प्राप्त कर लिया फिर कभी उन गुणों का नाश नहीं होता। प्रवचन आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी सही तो है, अनंत का
पर
“पर” तो संसार में भी अवांछनीय है, ये काम हो तो सकता है “पर”। परमार्थ में “पर” (दूसरे) पर उपयोग गया तो “मैं” से हटा।
व्रत/ विरति
व्रत निधि है, विरति निषेध। स्वाध्याय सान्निध्य आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी (19 अगस्त)
कर्मफल
पत्थर ऊपर फेंकने पर कम तेजी से जाता है। लौटता बहुत तेजी के साथ, सिर फोड़ देता है। कर्म ऊपर जाते पत्थर हैं, कर्म-फल लौटते
आकार
वर्ण, गंध, शब्द, स्पर्श, रस का भी आकर है क्योंकि ज्ञान का विषय साकार होता है। आचार्य श्री विद्यासागरजी (भगवती आराधना भाग 1,गाथा 4,पेज 53)
मन / वचन / काय
मन → बालक (चंचल)। वचन → पिता, कड़े शब्दों का प्रयोग। काय → माँ, पिटाई भी कर देती है। मुनि श्री मंगल सागर जी
णमोकार
श्री मूलाचार जी में कहा है की अंत में णमोकार मंत्र ही काम आने वाला है। इसलिए उसके बोलने/ चिंतन करने के इतने संस्कार डाल
आत्मा की जागरूकता
कैसे पता लगे कि मेरी आत्मा जाग्रत है या नहीं ? सुबह जगने आदि के लिये आत्मा को संबोधन करें कि मुझे इतने बजे जगा
सम्यग्दर्शन
सम्यग्दर्शन अकेला भी हो सकता है यदि अक्षर श्रुत ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम ना हो तो। आचार्य श्री विद्यासागरजी (भगवती आराधना भाग 1,गाथा 3,पेज 42) स्वाध्याय
हिंसा
एक हिंसा, हिंसा के लिये → महान दोष। दूसरी हिंसा, शुभ क्रियाओं में (पूजा, मंदिर निर्माण आदि) → जघन्य दोष। जीव दोनों में मरे, दूसरी
Recent Comments