Month: January 2025
वैमानिक देव
सम्यग्दर्शन की अपेक्षा से नहीं किंतु शुभ लेश्या के कारण वे विमानवासी देव माने जाते हैं। मान सम्मान के साथ वहाँ पर रहते हैं इसीलिए
दूसरे
दर्शनज्ञ सार्त्र ने कहा → “दूसरा(पर) नरक है।” उनके शिष्य ने कहा → इससे तो हम दूसरों का अस्तित्व हीन कर रहे हैं ? सो
केवलज्ञान / पुरुषार्थ
जब केवलज्ञान में भविष्य दिख रहा है तो पुरुषार्थ का क्या महत्व रह गया ? एक लड़के ने कीड़ा मुट्ठी में रखकर भगवान से पूछा
संसार की ऊर्जा
संसार की ऊर्जा को जीव तथा अजीव दोनों ही ग्रहण कर सकते हैं। जीव द्वारा ग्रहण तो दिखता है। अजीव में जैसे किसी स्थान में
पूर्वाग्रह
आजन्म करावास पूरा करके एक व्यक्ति ट्रेन से अपने गाँव की ओर जा रहा था। साथियों से बोला… स्टेशन आने पर जरा देख कर बताना
सुख / दु:ख
दु:ख पुरुषार्थ करके आता है। सुख बिना पुरुषार्थ किये क्योंकि सुखी रहना तो आत्मा का स्वभाव होता है। मुनि श्री मंगलानंद सागर जी
समाधि के बाद पिच्छी
समाधि के बाद पिच्छिका भक्त/ घरवालों को न देकर वहीं पेड़ पर लटका दी जाती है, ताकि दिवंगत जीव भवनत्रिक देव बनने की दशा में
परिग्रह / संग्रह
बाँध में पानी संग्रह किया जाता है, अनुग्रह के लिये। परिग्रह में विग्रह है, आसक्ति है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
श्रुतज्ञान
श्रुतज्ञान ही स्व(स्वार्थ)-पर(परार्थ) कल्याणक होता है। बाकी चार ज्ञान स्वार्थज्ञान ही हैं। केवलज्ञान भी जानता है पर उसके द्वारा दिव्यध्वनि नहीं खिरती। इसके लिये अन्य
कर्मों को धोना
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा था… यदि तुम प्रभु के पीछे-पीछे हो लोगे, हो लोगे तो निश्चित ही अपने पाप कर्म को धो लोगे,
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