Month: February 2025

क्रम पर्याय

आगम में “क्रम वर्तिनः पर्याय” कहा है यानी एक पर्याय के बाद दूसरी पर्याय क्रम से आती है। जैसे मनुष्य में बालपना, युवावस्था, वृध्दावस्था क्रम

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भरोसा

कच्चा घड़ा है, काम में मत लेना, बिना परीक्षा। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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चरित्र

“परिहार” के दो अर्थ होते हैं एक ग्रहण करना, दूसरा छोड़ना। ग्रहण कर्तव्य का, छोड़ना अकर्तव्य का; और इन दोनों के होने से बनता है

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भूत-अनुकम्पा

भूत-अनुकम्पा…. भूत = आयु + शरीर वाले (जो शरीर को ही स्वयं मानते हैं)। अनुकम्पा = दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानना। तब पीड़ा

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अगम्य स्थान

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया की आगम में अगम्य स्थान के बारे में वर्णन आता है। जिसमें अवधिज्ञान

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मैं

मैंने देखी, मैं की माया। मैं को खोकर, मैं ही पाया।। (रेनू – नयाबाजार मंदिर)

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मंगल आशीष

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February 3, 2025

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