Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
तप
तप से/ताप (गर्मी) से हम बहुत घबराते हैं। जबकि ताप के बिना न अनाजादि पैदा होगा, ना ही उसे पचा (जठराग्नि) पायेंगे। आचार्य श्री विद्यासागर
किससे बचना ?
अपरिचित से ज्यादा परिचित से बचो। आचार्य श्री विद्यासागर जी (अपरिचित से तो सावधान रहते हैं, परिचित से नहीं तथा मोह में भ्रमित भी रहते
वेग
1. वेग – काम करने की गति सामान्य/ कुछ अधिक। 2. आवेग – व्यक्ति के भावों में उछाल आता रहता है। 3. उद्वेग – उद्वलित/
सन्मार्ग
मोक्षमार्ग में मन व इंद्रियाँ काम नहीं करतीं, उनका निग्रह* काम करता है। *नियंत्रण / सीमांकन आचार्य श्री विद्यासागर जी
दादागिरी
दादा बने हो दादागिरी न करो दायरे में रहो आचार्य श्री विद्यासागर जी
ध्यान
अंतराय होने पर श्रावक रोने लगा। आचार्य श्री विद्यासागर जी… यह आर्तध्यान नहीं धर्मध्यान है।
अच्छे कार्य
अंतराय अच्छे कार्य में ही आते हैं। (तो अंतराय आने पर घबरायें नहीं, मानें आपके निमित्त से कुछ अच्छा कार्य हो रहा है) आचार्य श्री
ऊँचाई
कितने बड़े-बड़े जंगलों में बड़ी-बड़ी अग्नि लगी/ कितनी बार प्रलय आयी, पर आसमान गरम तक नहीं हुआ| कारण ? बहुत ऊँचाई पर है। यदि हम
मिथ्यात्व पर श्रद्धान
यदि यह श्रद्धान पक्का हो जाय कि संसार का कारण मिथ्यात्व है तो यह सम्यग्दर्शन उत्पन्न करने में निमित्त बन सकता है। आचार्य श्री विद्यासागर
बोलना
कविता में अनुशासन होता है; शब्दों का Repetition न होने आदि का। इसीलिये उसे बार-बार सुनने का मन होता है, सुहावनी होती है। गद्य में
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