Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

समता

अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी। आचार्य श्री विद्यासागर जी

Read More »

बुद्धि

कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा स्वामित्व भावों से बुद्धि भ्रष्ट होती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी

Read More »

प्यास

नीर नहीं तो, समीर सही प्यास, कुछ तो बुझे। भावार्थ – अत्यधिक गर्मी में पानी भले न मिले परन्तु ठंडी हवा चलती रहे तो प्यास

Read More »

पुण्य

पुण्य का त्याग कैसे करें ? इतना कितना पुण्य जमा कर लिया है कि त्याग करना चाहते हो/ त्याग करने की नौबत आ गयी ?

Read More »

अनुभूति

ऐसी स्वानुभूति करो कि किसी की सहानुभूति की आवश्यकता ही न रह जाये। आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

Read More »

मति

ना “श्री” भटकाती है, ना ही “श्रीमती”, बस “मति” भटकाती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

Read More »

सेवा

आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा –> मनुष्य की सबसे बड़ी सेवा क्या है ? अपनी मनुष्यता का एहसास करना। मुनि श्री विनम्रसागर जी

Read More »

विवाह

विवाह विषयों के निमंत्रण के लिये नहीं, नियंत्रण के लिये। विवाह दवा है, इसे भोजन मत बनाना। आचार्य श्री विद्यासागर जी

Read More »

मौन

शब्द पंगु हैं, जबाब न देना भी लाजबाव है। आचार्य श्री विद्यासागर जी

Read More »

अध्यात्म

कर्म के उदय को स्वीकार करना ही अध्यात्मविद्या है। आचार्य श्री विद्यासागर जी (मुनि श्री अक्षयसागर जी)

Read More »

मंगल आशीष

Archives

Archives
Recent Comments

July 25, 2025

May 2026
M T W T F S S
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031