विसंयोजना / उद्वेलना

विसंयोजना अनंतानुबंधी की ही, यह नरक में भी हो सकती है। इसमें 6-7 गुणस्थान से भी असंख्यातगुणी निर्जरा उस समय होती है जब विसंयोजना चल रही हो। इसमें द्रव्य निचली तीन कषायों में डाइवर्ट हो जाता है पर बाद में संयोजना भी हो सकती है।
उद्वेलना मिथ्यात्व* की ही होती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड – 7 मई)

* पिछली प्रकृति में चले जाना जैसे सम्यक्-प्रकृति का सम्यक्-मिथ्यात्व में सम्यक्-मिथ्यात्व का मिथ्यात्व में चला जाना।

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7 Responses

  1. विंसयोजना एवं उद्धेलना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।

  2. ‘विसंयोजना’ aur ‘उद्वेलना’ me difference explain karenge, please?

    1. साइट पर क्लेरिफाई किया, देखो अब ठीक है ! समझ आया ?

  3. नरक में भी kya ‘असंख्यातगुणी निर्जरा’ ho sakti hai ? Ise clarify karenge, please ?

    1. तत्त्वार्थ सूत्र में विसंयोजना की निर्जरा को 6-7 गुणस्थान वालों की निर्जरा से ऊपर रखा है। पर वह निर्जरा विसंयोजना के समय ही होती है जबकि मुनिराज के हर समय, सोते जागते।

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