संज्ञा तो हर संसारी जीव में पायी जाती हैं (10वें गुणस्थान तक)।
पर जब वे क्रिया रूप में परिवर्तित होती हैं तब घातक हो जाती हैं, तब कर्म-बंध भी बहुत ज्यादा होता है।
चिंतन
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संज्ञा/क़िया को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
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