संयम

वृतियों को अवृतियों से नहीं पढ़ना चाहिये वरना वृतियों में संयम के प्रति रुचि कम होने लगती है।
(पं पन्नालाल जी को षटखंडागम कंठस्थ था, पर आचार्य श्री ने ब्रह्मचारियों को उनसे तब पढ़वाया, जब उन्होंने 7 प्रतिमायें ले लीं)

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Share this on...

One Response

  1. संयम का तात्पर्य वृत व समिति का पालन करना होता है। इसमें मन वचन काय की अशुभ प्रवृत्ति का त्याग करना एंड इन्द्रियों को वश में रखना होता है।
    उपरोक्त कथन सत्य है कि वृतियों को आवृत्तियों से नहीं पढना, क्योंकि उसमें संयम का अभाव रहता है। अतः आचार्य श्री ने पंडित जी से ब्रम्हचारियों को तब पढवाया जब 7 प़तिमायें का नियम लिया गया था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This question is for testing whether you are a human visitor and to prevent automated spam submissions. *Captcha loading...

Archives

Archives
Recent Comments

August 27, 2021

April 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
27282930