मज़ा / आनंद
मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का।
*आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/24)
*(लंबे समय का या Permanent।)
मज़ा… संसार पर आश्रित। अल्प समय का।
*आनंद.. गुरु/ भगवान के निमित्त/ निकटता/ उनकी सेवा करने से।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/24)
*(लंबे समय का या Permanent।)
One Response
मज़ा/आनन्द को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु मज़ा की जगह आनन्द का प़यास करना आवश्यक है।आनन्द के लिए धर्म से जुड़कर भगवान् एवं गुरुजनों से निकटता रखना परम आवश्यक है।