रागद्वेष में वासना आ जाती है, जो संसार बढ़ाने में निमित्त है। लेकिन रागद्वेष की एक समय की पर्याय वासना का रूप नहीं लेती।
क्षु. सहजानन्द जी
(तभी तो कहते हैं, “देखो, तको मत! खाओ, भखो मत!”)
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राग द्बेष को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु राग द्बेष से बचना परम आवश्यकता है। जीवन में राग करना है तो गुरु एवं भगवान से करना परम आवश्यक है।
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राग द्बेष को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण हेतु राग द्बेष से बचना परम आवश्यकता है। जीवन में राग करना है तो गुरु एवं भगवान से करना परम आवश्यक है।