क्षु. श्री जिनेंद्र वर्णी जी की सल्लेखना आचार्य श्री विद्यासागर जी के सानिध्य में चल रही थी।
एक दिन आचार्य श्री सम्बोधन देने देर से पहुँचे।
वर्णी जी ने परेशान होकर कहा –> “मुझे छोड़ कर न चले जाना, सल्लेखना बिगड़ जायेगी”
आचार्य श्री… “वर्णीजी ! सल्लेखना तो स्वयं ली जाती है।”
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सल्लेखना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए सल्लेखना का निर्णय स्वयं का होना परम आवश्यक है।
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सल्लेखना को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए सल्लेखना का निर्णय स्वयं का होना परम आवश्यक है।