अगुरूलघु, उप/पर घात, रसादि, आतप, उद्योत, प्रत्येक/ साधारण, शुभ/ अशुभ, स्थिर/ अस्थिर आदि 62 प्रकृतियाँ पुद्गल विपाकी हैं।
ऐसे चिंतन से रागद्वेष कम होता है कि ये तो पुद्गल विपाक के कारण से है, अपने जीव को इनसे नहीं जोड़ना है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8/53)
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पुद्बल विपाकी को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है।
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