पुरुषार्थ और नियति
पुरुषार्थ का अर्थ प्रयत्न नहीं, अपितु पुरुष का उद्देश्य है। आत्मा ही हो प्रयोजन जिसका वह पुरुषार्थ है, यही नियति है। अपने में ही पुरुषार्थ करना नियति है।
“नि” यानी निज में, “यति” माने विश्राम लेना, इसी का नाम नियति है। “पुरुष” यानी आत्मा और “अर्थ” यानी प्रयोजन। सही दिशा में प्रयत्न करना ही पुरुषार्थ हो तो ध्यान ही सही पुरुषार्थ है।
ध्यान का अर्थ है समता रखो। यह समता ही सभी कर्मों के अपाय के कारण हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी (स्वाध्याय श्री भगवती आराधना- भाग 1, पृष्ठ 118)
सान्निध्य आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी



