यंत्र —> पौद्गलिक का सहारा जैसे स्पीकर।
मंत्र —> अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना।
तंत्र —> भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना।
जैसे जिनदर्शन से निधत्ति/ निकाचित कर्म कट जाते हैं।
संसार/ घर भी इसी से चलता है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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यंत्र/मंत्र/तंत्र को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए तीनों मंत्रों का उपयोग कर्म काटने एवं आत्मा की विशुद्बी आदि में काम आतें है।
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यंत्र/मंत्र/तंत्र को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए तीनों मंत्रों का उपयोग कर्म काटने एवं आत्मा की विशुद्बी आदि में काम आतें है।