सृजन

1-2 ग्राम का बीज अंकुरित होते समय टनों टन मिट्टी को हटाने का पुरुषार्थ कर लेता है। वह अंकुर हमेशा ऊपर उठता है, हमारे पुरुषार्थ भी उन्नत होते हैं। अंकुर पौधा बनता है फिर वृक्ष बनता है, यहाँ तक की सृजन क्रिया शांत होती है लेकिन जब वृक्ष गिरता है तो बहुत शोर होता है, यह है विसर्जन की क्रिया।
जब हम शांत होते हैं तो रचनात्मक स्थिति होती है और जब हमारे जीवन में अशांति/ अकुलता/ व्याकुलता होती है तो समझिए विसर्जन हो रहा है। किसान बीज बोते समय यह नहीं देखता कि बीज उल्टा पड़ रहा है या सीधा, वह सिर्फ देखता है कि उसकी जमीन उपजाऊ है या नहीं, यदि नहीं है तो उसके लिये प्रयास करता है। पर हम गुरु से उम्मीद करते हैं कि वो बीज बोये, अपनी जमीन को नहीं सुधारते/ उपजाऊ नहीं बनाते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 6 मई)

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6 Responses

  1. सृजन का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए सृजन को अपनाना परम आवश्यक है।

  2. ‘जब हमारे जीवन में अशांति/ अकुलता/ व्याकुलता होती है तो समझिए विसर्जन हो रहा है’; Is line me ‘विसर्जन’ ka meaning clarify karenge, please ?

    1. विसर्जन यानी छूटना/ गिरना।
      किसका ? आत्मा का जैसे बीज से पेड़ बनना सृजन है, पेड़ का गिरना विसर्जन।

  3. Hum apni आत्मा ko उपजाऊ kaise bana sakte hain ? Ise clarify karenge, please ?

    1. अवगुणों की घासफूस को निकालते रहें, गुणों की खाद डालते रहें, विनम्रता से सींचते रहें।

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