Month: October 2026

पूछ

पूछ की इच्छा मायाचारी है, अगले जन्म में पूँछ वाला बनने की तैयारी है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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अघातिया कर्म

सूक्ष्मत्व –> नाम कर्म के अभाव से अवगाहनत्व –> आयु कर्म के अभाव से अव्याबाध –> गोत्र या वेदनीय के अभाव से अगुरुलघु –> वेदनीय

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आत्मा

आत्मा का चिंतन/ परिचय कैसे करें ? आत्मा के गुणों (श्रद्धा/ ज्ञान/ दयादि) का चिंतन करने तथा इन गुणों को जीवन में उतारने से परिचय

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कर्म-बन्ध

अधिकतर पाप-बन्ध –> अजीव-अधिकरण से जैसे मकान, पैसा। दूसरे नंबर पर सचित्त-अचित्त जैसे पिता का धन, शरीर के साथ जीव। सिर्फ जीव से तो बहुत

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वासना

जिसमें वास हो जाए। एक समय के राग को वासना नहीं कहते। उस राग में बस जाना वासना है। चिंतन

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परमुख

ज्यादातर कर्म जैसे बांधे, उस रूप फल नहीं देते हैं। चार गतियों में से तीन परमुख फल देती हैं। ऐसे ही भगवान को तो सुन

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सावधान

करवट चाहे रात में बदलें या दिन में, Left को लें चाहे Right को, सावधान रहते हैं (ताकि गिर ना जायं)। जब समय बदले (अच्छा

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कर्म / उपयोग

श्रावक के कर्म में उपयोग है तथा उपयोग में कर्म। श्रमण के न कर्म में उपयोग, ना ही उपयोग में कर्म। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर

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श्रुतकेवली

द्रव्य श्रुतकेवली… पढ़ना/ पढ़ाना, साधक (कम से कम 5 समिति + 3 गुप्ति धारी ) भाव श्रुतकेवली… ध्यान/ उपादेय/ साध्य/ शब्दातीत/ ज्ञानात्मक परिणति/ आत्मा का

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मंगल आशीष

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October 17, 2026

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