Month: October 2026

तन / चेतन

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे…. जितना-जितना तन को सजा रहा है, उतना-उतना चेतन को सज़ा दे रहा है। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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वचन / प्रवचन

वचन… दो इंद्रियों से लेकर पंचेेंद्रिय में। इनमें सत्य, असत्य, उभय तथा अनुभय कुछ भी हो सकता है। प्रवचन…पंचेेंद्रियों (मनुष्य, मुनि, केवलियों) के द्वारा ही।

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ज्ञान / आचरण

8 वर्ष के बालकों (चक्रवर्ती भरत के पुत्र) का मन समवसरण में नहीं लग रहा। घर लौटना भी नहीं चाह रहा जैसे चक्रवर्ती लौट जाता

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सेवानिवृत्ति

सर्विस में Full Pay, सेवानिवृत्त होने पर Half Pay. पहले Full Health, बाद में Half। लेकिन 21 साल से बिना काम किये, आधी पगार मिलने

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निश्चय

व्यवहार की अधिकता -> संसार अधिक। काम की पूर्णता/ गति, व्यवहार + निश्चय से ही। व्यवहार परतंत्र, निश्चय स्वतंत्र। निश्चय होने के बाद व्यवहार से

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इंतज़ार

एक लघु फिल्म ने बहुतों को बोध कराया… दो बुज़ुर्ग बैठे तीसरे मित्र का इंतज़ार कर रहे हैं। 5 मिनट बाद…. पहला…वह नहीं आया। दूसरा..

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कर्म-बंध

बंध के कारण –> भाव-कर्म। बंध का कार्य —> द्रव्य-कर्म। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र 8/01, 8/02) (भावकर्म कारण और द्रव्यकर्म कार्य. भावकर्म रूप

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चिंता

ईरानी संत चिंतित कि उन्हें भगवान कैसे मिलें ! समुद्र के किनारे छोटा बच्चा भी चिंतित कि समुद्र को प्याली में कैसे भरूँ !! दोनों

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प्रकृति बंध

कर्म वर्गणा एक रूप बंधने के बाद चार रूप (प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश)। सबसे पहले प्रकृति बंधती है। किस गुण को बाधित करेगी जैसे ज्ञान,

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मंगल आशीष

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October 7, 2026

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