Category: चिंतन

संगति

संगति… गंगा का शुद्ध जल भी नाली में गंदा हो जाता है। चिंतन

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शरीर / आत्मा

आत्मा शरीर के माध्यम से भोग करती है। तभी तो शरीर पर चींटी, अनुभव आत्मा करती है। आत्मा निकलने के बाद बिच्छू भी काट ले

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प्रवेश

अपने मकान/ मच्छरदानी में एक छोटे से मच्छर का भी प्रवेश वर्जित है। अपनी आत्मा में दुश्मनों का भी प्रवेश वर्जित नहीं ! चिंतन

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उत्कृष्ट / निकृष्ट

उत्कृष्टता की तीन श्रेणी* ——> 10, 16, 25% दान देने वाले। निकृष्टता की भी तीन श्रेणी** –> 90, 84, 75% समय/ ध्यान (भगवान/ गुरु/ शास्त्र

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राग

राग बिना…. केवलज्ञान, राग सहित… केवल अज्ञान। चिंतन

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दुष्ट

दुष्ट घोड़े को जितना रोको उतना ही और ज्यादा दौड़ता है। ऐसे ही दुष्ट आदमी और दुष्ट मन की भी प्रकृति होती है। चिंतन

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शरीर / आत्मा

क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरु हो रही हो? यदि हाँ तो आत्मा मरते हुये शरीर को क्यों

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ट्रेन पकड़ना

1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!), पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),

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सुख

सुख चाहते हो तो सद्गृहस्थ बनो। सच्चा सुख चाहते हो साधु बनो। चिंतन

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सत्य

सत्य पहले तथा कई बार स्वीकारा जाता है तब एक बार कहा जाता है। इस अपेक्षा से स्वीकार करने में ज्यादा शक्ति लगती है। चिंतन

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मंगल आशीष

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