Category: चिंतन
उत्कृष्ट / निकृष्ट
उत्कृष्टता की तीन श्रेणी* ——> 10, 16, 25% दान देने वाले। निकृष्टता की भी तीन श्रेणी** –> 90, 84, 75% समय/ ध्यान (भगवान/ गुरु/ शास्त्र
दुष्ट
दुष्ट घोड़े को जितना रोको उतना ही और ज्यादा दौड़ता है। ऐसे ही दुष्ट आदमी और दुष्ट मन की भी प्रकृति होती है। चिंतन
शरीर / आत्मा
क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरु हो रही हो? यदि हाँ तो आत्मा मरते हुये शरीर को क्यों
ट्रेन पकड़ना
1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!), पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),
सत्य
सत्य पहले तथा कई बार स्वीकारा जाता है तब एक बार कहा जाता है। इस अपेक्षा से स्वीकार करने में ज्यादा शक्ति लगती है। चिंतन
मनुष्यों के भेद
मनुष्यों की श्रेणियाँ… कंजूस – मेरा 1 रुपया खर्च न हो, दूसरे के चाहे हज़ारों। संतुलित – मैं भी खर्च करूँ, दूसरे को भी करने
शुद्धता
बर्तनों को शुद्ध, राख से करते हैं। आत्मा को गुरु/ भगवान की “चरण-रज” से। भगवान की “चरण-रज” कैसे मिले ? भगवान के गंधोदक से (स्नान
जिंदा
जो दूसरों को जिंदा न रहने दे, उसे जिंदा नहीं कह सकते/ उसे जिंदा रहने का अधिकार नहीं। 2) जो गुरु/ भगवान के सामने अकड़ा
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