Category: चिंतन

दुष्ट

दुष्ट घोड़े को जितना रोको उतना ही और ज्यादा दौड़ता है। ऐसे ही दुष्ट आदमी और दुष्ट मन की भी प्रकृति होती है। चिंतन

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शरीर / आत्मा

क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरु हो रही हो? यदि हाँ तो आत्मा मरते हुये शरीर को क्यों

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ट्रेन पकड़ना

1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!), पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),

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सुख

सुख चाहते हो तो सद्गृहस्थ बनो। सच्चा सुख चाहते हो साधु बनो। चिंतन

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सत्य

सत्य पहले तथा कई बार स्वीकारा जाता है तब एक बार कहा जाता है। इस अपेक्षा से स्वीकार करने में ज्यादा शक्ति लगती है। चिंतन

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मनुष्यों के भेद

मनुष्यों की श्रेणियाँ… कंजूस – मेरा 1 रुपया खर्च न हो, दूसरे के चाहे हज़ारों। संतुलित – मैं भी खर्च करूँ, दूसरे को भी करने

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शुद्धता

बर्तनों को शुद्ध, राख से करते हैं। आत्मा को गुरु/ भगवान की “चरण-रज” से। भगवान की “चरण-रज” कैसे मिले ? भगवान के गंधोदक से (स्नान

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जिंदा

जो दूसरों को जिंदा न रहने दे, उसे जिंदा नहीं कह सकते/ उसे जिंदा रहने का अधिकार नहीं। 2) जो गुरु/ भगवान के सामने अकड़ा

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पापात्मा

जो पाप क्रियाओं में आनंद लें और पुण्य क्रियाओं को बोझा मानें, वे पापात्मा। चिंतन

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संसार की उपयोगिता

संसार की एक उपयोगिता यह भी है कि यहाँ सुख का Taste/ पहचान हो जाती है (सुखाभास के रूप में)। तभी तो असली/ Permanent/ अनन्त

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मंगल आशीष

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