Category: चिंतन
दुःख
व्यक्ति जीवित है/ होश में है, परीक्षण के लिये नुकीली चीज पैरों में चुभा कर देखते हैं। दुःख भी ऐसे ही हैं, हमको एहसास दिलाते
आत्मा / शरीर
हम मकान क्यों/ कब छोड़ते हैं ? Contract की अवधि पूरी होने पर। समय पूरा होने से पहले मकान जीर्ण-शीर्ण हो जाये। आत्मा भी शरीर
पर
“पर” तो संसार में भी अवांछनीय है, ये काम हो तो सकता है “पर”। परमार्थ में “पर” (दूसरे) पर उपयोग गया तो “मैं” से हटा।
आत्मा की जागरूकता
कैसे पता लगे कि मेरी आत्मा जाग्रत है या नहीं ? सुबह जगने आदि के लिये आत्मा को संबोधन करें कि मुझे इतने बजे जगा
ध्यानस्थ
ध्यानस्थ… भौंरे को फूल पर गुनगुनाते समय पराग का स्वाद नहीं आता। जब स्वाद लेता है तब गुनगुनाता नहीं। ब्र. प्रदीप पियूष हम भी गृहस्थी
माना
गणित में सवाल हल करते समय, “माना कि” से सवाल हल हो जाते हैं। पर जीवन में जो तुम्हारा है नहीं, उसे अपना मान-मान कर
कांटे
कांटों का भी अपना महत्त्व होता है। यदि वे न होते तो हम कितने कीड़े मकोड़ों को कुचलते चले जाते तथा फूल भी सुरक्षित न
ज्ञान
लौकिक जो संसार बढ़ाये। अलौकिक जो संसार घटाये। (धर्म का) पारलौकिक जो संसार से परे का हो जैसे आत्मादि। चिंतन
रसना
रसना को नागिन क्यों कहा ? इसी के चक्कर में आकर Overeating करके पेट/ सेहत में ज़हर घोलते हैं। इसी से ज़हरीले वचन निकलते हैं
वीतरागता
आँसू चाहे खुशी के हों या दु:ख के, दृष्टि को तो धूमिल करते ही हैं। इसीलिए वीतरागता का इतना महत्व है। चिंतन
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