Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

मोह

क्रोध, मानादि AC Current हैं, Shock देते हैं। मोह DC, चिपका लेता है, जब तक पूरा न चूस ले। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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कितना ?

रिक्त को भरने की मनाही नहीं, अतिरिक्त में दोष है। फिर चाहे वह भोजन हो या धन। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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संकलन

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… बांध-बांध कर क्यों रखना ! जब ख़ुद को बंध कर जाना ही है। अर्थी पर भी, कर्मों से भी

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ब्रह्मचर्य

आचार्य श्री विद्यासागर जी…. उधारी 40 वर्ष पुरानी हो जाये तो खाते में से निकाल देते हैं। शादी 40 साल तक नहीं हो तब तो

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विचार / शरीर

जब तक हमारे विचारों में शुद्धि, सामर्थ्य तथा एकता न हो, शरीर के कोशिकाओं की तंदुरुस्ती, सामर्थ्य तथा एकता को बनाए रखना असम्भव है। आचार्य

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समता

अस्वस्थ होते हुए भी हम स्वस्थ हैं, ऐसी धारणा बनाने से समता आयेगी। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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बुद्धि

कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा स्वामित्व भावों से बुद्धि भ्रष्ट होती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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प्यास

नीर नहीं तो, समीर सही प्यास, कुछ तो बुझे। भावार्थ – अत्यधिक गर्मी में पानी भले न मिले परन्तु ठंडी हवा चलती रहे तो प्यास

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पुण्य

पुण्य का त्याग कैसे करें ? इतना कितना पुण्य जमा कर लिया है कि त्याग करना चाहते हो/ त्याग करने की नौबत आ गयी ?

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अनुभूति

ऐसी स्वानुभूति करो कि किसी की सहानुभूति की आवश्यकता ही न रह जाये। आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

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मंगल आशीष

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