अंकित जैन आगरा के अस्पताल में वेंटीलेटर पर थे। अस्पताल में ऑक्सीजन समाप्त हो रही थी।
अंकित के आग्रह पर मुनि श्री प्रमाणसागर जी का सम्बोधन रिकार्ड करवा के सुनाया गया।
ऑक्सीजन समाप्त होने पर भी अंकित सहज रहे।
उनके लिये ऑक्सीजन सिलेन्डर दिल्ली से भेजा गया पर तब तक अंकित उस स्थिति से बाहर आ चुके थे, उनने सिलेन्डर का भी प्रयोग नहीं किया, अन्य मरीजों को दे दिया।
(अंजू – कोटा)
“पर” के ऊपर की गयी दया से स्वयं की याद आती है (आत्मा की, उसके दया स्वभाव की)।
जैसे चंद्र पर दृष्टि डालने से, नभ पर भी दृष्टि पड़ती है।
(नभ पर दृष्टि डालने से, चंद्र पर भी दृष्टि पड़ती है)
आचार्य श्री विद्यासागर जी (मूकमाटी)
करोड़पति (बड़ा) बनने के लिये लखपतिपने (छोटे को/लोभ) को छोड़ना पड़ेगा।
ऐसे ही संसार का लोभ/ आकर्षण छोड़ने पर ही मोक्ष प्राप्त हो सकेगा।
चिंतन
आत्मा समझ में नहीं आता तो अनात्मा को समझ लो।
“पर” को भूलने की कला सीख ली तो स्व (आत्मतत्त्व) प्राप्त हो जायेगा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
धन से सम्बंध उतना ही रखो जैसे दीपक जलाते समय माचिस और तीली का होता है।
तीली के ज्यादा पास आये तो जल जाओगे, तब तीली को फेंक देते हैं।
ऑंख बंद होने से पहले फेंक दो, वरना कुंडलीमार बनकर रखवाली करते फिरोगे।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
महावीर भगवान ने सृष्टि के अनुरूप अपनी दृष्टि बनायी।
बौद्ध आदि जैसा महावीर भगवान के नाम से कोई धर्म नहीं बना।
दया, चारित्र, वस्तु के स्वभाव को धर्म कहा।
सच्चा ज्ञान वह नहीं जो दिख रहा है बल्कि यथार्थ को जानना है।
सृष्टि को देखना/समझना धर्म है।
मुनि श्री सुधासागर जी
रेखा 5 K.M. 50″ पहुंचती है, सरिता 40″ में, स्वस्थ कौन?
पर अन्य Factors पर ध्यान दिया?
सरिता यदि बालू पर! उनकी उम्र, वजनादि पर।
अवसर, संसाधन, समस्यायें अलग-अलग हो सकते हैं!
निर्णय लेते समय इनका ध्यान रखना होगा।
(अपूर्वा श्री)
मैं के साथ विशेषण “अह्म” को जन्म देता है, हटते ही/”मैं” को “मैं रूप” देखते ही “अर्हम” आ जाता है।
“अह्म” से “अर्हम” तक की यात्रा ही मोक्षमार्ग है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
संसार सागर में कश्ती तो भाग्य की लहरों/हवा के सहारे ही चलती/पहुँचती है।
पुरुषार्थ का काम तो बस डूबने से बचाने के लिये Balance बनाये रखना है।
चिंतन
अमीर भी गरीब तब बन जाता है जब उसे अपने से ज्यादा अमीर की अमीरी दिखने/खलने लगती है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जो निश्चित है, उस पर विश्वास न होने से संकल्प/विकल्प रूप मानसिक दु:ख होता है।
निश्चित को मानने से संतोष आ जाता है जैसे मृत्यु को निश्चित मानने के बाद सोचता है – इतने में ही जीवन चल जायेगा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
आम का पेड़ परोपकारी या स्वार्थी ?
सबको मीठे-मीठे/स्वास्थवर्धक फल देता है, सो परोपकारी।
पर इसके पीछे छिपा अभिप्राय – कि गुठलियों के बिखरने से उसकी संतति बढ़ेगी, सो स्वार्थी।
यानि स्व-पर हितकारी।
यही स्वभाव Long-lasting and Practicable है।
चिंतन
एक कंजूस सेठ ने सही निर्णय लिया कि वह अपनी सम्पत्ति दान कर देगा।
पूछा कब कर रहे हो?
मरने के बाद।
हंसी का पात्र बना।
क्योंकि समय सही नहीं चुना था।
(क्या हम सही निर्णय/ सही समय पर ले रहे हैं ?)
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
आत्मा की बात सुनने के लिये संस्कार आवश्यक होते हैं।
जैसे इंजेक्शन लगाने के लिये स्प्रिट।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments