स्व-धन/वस्तु का त्याग,
जिससे “स्व”, “पर” का उपकार हो;
“स्व” का उपकार ?
अपनी आत्मा का उपकार।
कैसे होगा ?
जिनालय, जिनवाणी, जिन गुरु* के लिये धन/वस्तु का उपयोग करने से।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
* जिन = भगवान, गुरु = ऐसे गुरु जो सच्चे भगवान की सच्ची साधना में लगे रहते हों।
बच्चों की प्रार्थना में बड़ों से ज्यादा चमत्कार क्यों होता है ?
उनकी सरलता/ निर्मलता के अलावा उनकी Dictionary में “ना” नाम की चीज नहीं होती, शायद यही कारण है कि नियति को भी बच्चों की ज़िद पूरी करनी पड़ती है जैसे माता-पिता पूरी करते हैं।
1. धर्म के पात्र…………… आत्म विशुद्धि के निमित्त
2. दया/सहायता के पात्र… पुण्य अर्जन के निमित्त
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
Talent का सीमित क्षेत्र है, प्रारम्भिक अवस्था में यह पहला दरवाजा खोलता है पर Ego आने का बहुत ख़तरा रहता है।
Attitude लगातार फायदेमंद रहता है, आगे के दरवाजे खोलता रहता है जैसे Australian Army में Elite Wings के लिये उन लोगों को चुना गया जो कभी न कभी फेल हुये थे, बाद में सफल हुये।
(डॉ.पी.एन.जैन)
Technology और धर्म विरोधी नहीं, पूरक हैं – जैसे Social Media की ज्यादातर चीजें अविश्वसनीय होती हैं ।
यही तो धर्म कहता है – जो दिखता है वह प्राय: सत्य नहीं होता, इससे धर्म पर विश्वास और बढ़ जाता है ।
चिंतन
युवा ट्रेन में रो रहा था।
कारण ?
गलत ट्रेन में बैठ गया था।
ट्रेन बदल क्यों नहीं लेता ?
क्योंकि इस ट्रेन में सीट बहुत आरामदायक मिल गयी है।
हम सबकी भी यही स्थिति है –
जानते हैं कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं/दु:खी भी हो रहे हैं पर दिशा बदलना नहीं चाहते हैं क्योंकि जीवन आराम से चल रहा है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(रवि कांत जैन)
जब तक संसार में हो – भोगो मत पर भागो भी मत, भाग लो – Adjust करके।
जो संसार में Adjust नहीं कर पाते, वे परमार्थ में भी स्थिर नहीं रह पाते हैं।
मुनि श्री सुधासागर जी
शुभ क्रियाओं में रुचि 3 प्रकार की –
1. कब पूरी होंगी ? – जघन्य/हल्की
2. पूरी तो नहीं हो जायेंगी – मध्यम
3. पूरी होने ना होने पर ध्यान ही नहीं, बस वर्तमान में आनंदित – उत्कृष्ट
अशुभ क्रियाओं में भी ऐसे ही घटित करें –
1.उत्कृष्ट
2.मध्यम
3.जघन्य
चिंतन
मरना है तो मर जा,
पर जीते जी कुछ कर जा,
अन्यथा कर्जा तो मत ले कर जा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
(जितने कर्म लेकर आये हो, उससे ज्य़ादा कर्म तो मत ले कर जा)
“वक्त पर बोये ज्वार मोती बनें” ।
एक गरीब ज्योतिषी ने विलक्षण मुहूर्त देखा, जिसमें अनाज हवन में डालने पर वे मोती बन जाएंगे। पर घर में ज्वार नहीं थे सो पड़ोसिन से ज्वार मांगने पर उसे कारण भी बता दिया। छत पर हवन मंत्रोच्चारण के साथ शुरू हुआ। पड़ौसिन ने भी अपनी छत पर अपना हवन शुरु कर दिया। मुहूर्त आने पर ज्योतिषी ने ज्वार डालने को स्वाहा बोला, पड़ौसिन ने तुरंत अपने ज्वार डाल दिए और वे मोती बन गए; पर ज्योतिषी की पत्नी ने पूछा ज्वार पूरे डालने हैं या एक-एक मुट्ठी, मुहूर्त निकल गया, मोती तो बने नहीं, ज्वार भी जल गए।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते हैं – समय पर किया गया काम समय (आत्मा/विशुद्धता) की ओर ले जाता है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
वैसे तो सत्य अखंड है पर व्यवहार चलाने में खंडित हो जाता है जैसे सत्य यह है कि रोटी पूर्ण होती है पर माँ खंडित करके परोसती है (होटल में साबुत, ताकि गिन सकें), फ़िर दांत उसके और टुकड़े टुकड़े कर देते हैं, रही सही कसर आंत उसे और महीन ।
मुनि श्री सुधासागर जी
12 जनवरी’07 को दुनिया के सबसे प्रसिद्ध वायलन बजाने वाले Joshua Bell ने अमेरिका में New York के Metro Station पर एक घंटा वायलन बजाया।
7 लोगों ने थोड़ी-थोड़ी देर सुना, 15 लोगों ने कुल 30 डालर डाले।
अगले दिन Bell का प्रोग्राम हुआ जिसकी टिकिट 100 डालर थी।
House full होने के कारण टिकट मिल नहीं रहीं थीं।
प्रश्न ?
1. हम Value किसकी करते हैं ? नाम की, जिसके लिये पैसे खर्च किये हों !
2. हमारी प्राथमिकता क्या है ? Rat Race या आनंद !!
(डॉ.पी.एन.जैन)
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